राजनीति का नया स्वाद: भोजन बना हथियार
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पश्चिम बंगाल के 15 दिवसीय दौरे से पहले ही राज्य की राजनीति में नया मोड़ आ गया है। शाह के दौरे की तैयारियों के बीच टीएमसी ने एक अनोखा ‘स्वागत’ किया है। पार्टी ने शाह को बंगाल के स्थानीय मांसाहारी व्यंजनों का आनंद लेने का ‘सुझाव’ देकर सियासी हमला बोल दिया है।
क्या है टीएमसी का इशारा?
टीएमसी का यह कदम उसके उस अभियान का हिस्सा है, जिसमें वह बीजेपी को बंगाल की सांस्कृतिक परंपराओं, खासकर खान-पान की आदतों से कटा हुआ बताती रही है। पार्टी का संदेश साफ है – बंगाल की पहचान उसके व्यंजनों से है, और यहाँ की राजनीति को समझने के लिए इस ‘स्वाद’ को स्वीकारना होगा।
‘मछली-मांस’ के पीछे का राजनीतिक समीकरण
यह घटना सिर्फ भोजन तक सीमित नहीं है। यह एक सांस्कृतिक प्रतीकवाद है। टीएमसी लंबे समय से बीजेपी पर राज्य की बहुलवादी संस्कृति पर हमला करने का आरोप लगाती रही है। मछली और मांस के व्यंजनों की सिफारिश इसी आरोप को मजबूती देने की कोशिश है। इसके जरिए वह संदेश देना चाहती है कि बीजेपी का ‘एकरसता’ का एजेंडा बंगाल की ‘विविधता’ के सामने टिक नहीं पाएगा।
चुनावी रणनीति या सांस्कृतिक दावा?
आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए यह घटना महत्वपूर्ण है। टीएमसी बंगाल की स्थानीय पहचान को मजबूती से अपना राजनीतिक मुद्दा बना रही है। अमित शाह का लंबा दौरा बीजेपी के लिए जमीन तैयार करने के लिए है, लेकिन टीएमसी ने उनके आगमन से पहले ही बंगाल के ‘रसोईघर’ से जवाबी हमला शुरू कर दिया है। साफ है, अब राजनीतिक लड़ाई सड़कों और रैलियों के साथ-साथ थाली तक पहुँच चुकी है।
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